श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.59.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 59 · अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः

निरीक्ष्य दुर्मर्षण आस्रवन्मदै-

र्गजैः पयोधिप्रभवैर्निराक्रमत्।

दृष्ट्वा सभार्यं गरुडोपरि स्थितं

सूर्योपरिष्टात् सतडिद्घनं यथा।

कृष्णं स तस्मै व्यसृजच्छतघ्नीं

योधाश्‍च सर्वे युगपत् स्म विव्यधुः॥ १५

nirīkṣya durmarṣaṇa āsravanmadai-

rgajaiḥ payodhiprabhavairnirākramat|

dṛṣṭvā sabhāryaṃ garuḍopari sthitaṃ

sūryopariṣṭāt sataḍidghanaṃ yathā|

kṛṣṇaṃ sa tasmai vyasṛjacchataghnīṃ

yodhāśca sarve yugapat sma vivyadhuḥ|| 15

अर्थ

भगवान्‌के शस्त्रप्रहारसे सेनापति पीठ और उसके साथी दैत्योंके सिर, जाँघें, भुजा, पैर और कवच कट गये और उन सभीको भगवान्‌ने यमराजके घर पहुँचा दिया। जब पृथ्वीके पुत्र नरकासुर (भौमासुर) ने देखा कि भगवान् श्रीकृष्णके चक्र और बाणोंसे हमारी सेना और सेनापतियोंका संहार हो गया, तब उसे असह्य क्रोध हुआ। वह समुद्रतटपर पैदा हुए बहुत-से मदवाले हाथियोंकी सेना लेकर नगरसे बाहर निकला। उसने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अपनी पत्‍नीके साथ आकाशमें गरुड़पर स्थित हैं, जैसे सूर्यके ऊपर बिजलीके साथ वर्षाकालीन श्याममेघ शोभायमान हो। भौमासुरने स्वयं भगवान्‌के ऊपर शतघ्नी नामकी शक्ति चलायी और उसके सब सैनिकोंने भी एक ही साथ उनपर अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र छोड़े॥ १४-१५॥

यह अर्थ श्लोक 14–15 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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