श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.6.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

तां तीक्ष्णचित्तामतिवामचेष्टितां

वीक्ष्यान्तरा कोशपरिच्छदासिवत्।

वरस्त्रियं तत्प्रभया च धर्षिते

निरीक्षमाणे जननी ह्यतिष्ठताम्॥ ९

tāṃ tīkṣṇacittāmativāmaceṣṭitāṃ

vīkṣyāntarā kośaparicchadāsivat|

varastriyaṃ tatprabhayā ca dharṣite

nirīkṣamāṇe jananī hyatiṣṭhatām|| 9

अर्थ

मखमली म्यानके भीतर छिपी हुई तीखी धारवाली तलवारके समान पूतनाका हृदय तो बड़ा कुटिल था; किन्तु ऊपरसे वह बहुत मधुर और सुन्दर व्यवहार कर रही थी। देखनेमें वह एक भद्र महिलाके समान जान पड़ती थी। इसलिये रोहिणी और यशोदाजीने उसे घरके भीतर आयी देखकर भी उसकी सौन्दर्यप्रभासे हतप्रतिभ-सी होकर कोई रोक-टोक नहीं की, चुपचाप खड़ी-खड़ी देखती रहीं॥ ९॥

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