वे अपने कमलके समान कोमल और नखोंकी लालिमासे कुछ-कुछ लाल प्रतीत होनेवाले चरणोंसे धरती कुरेदने लगीं। अंजनसे मिले हुए काले-काले आँसू केशरसे रँगे हुए वक्षःस्थलको धोने लगे। मुँह नीचेको लटक गया। अत्यन्त दुःखके कारण उनकी वाणी रुक गयी और वे ठिठकी-सी रह गयीं॥ २३॥
पदा सुजातेन नखारुणश्रिया
भुवं लिखन्त्यश्रुभिरंजनासितैः।
आसिंचती कुंकुमरूषितौ स्तनौ
तस्थावधोमुख्यतिदुःखरुद्धवाक्॥ २३
वे अपने कमलके समान कोमल और नखोंकी लालिमासे कुछ-कुछ लाल प्रतीत होनेवाले चरणोंसे धरती कुरेदने लगीं। अंजनसे मिले हुए काले-काले आँसू केशरसे रँगे हुए वक्षःस्थलको धोने लगे। मुँह नीचेको लटक गया। अत्यन्त दुःखके कारण उनकी वाणी रुक गयी और वे ठिठकी-सी रह गयीं॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 513) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/60/23/