॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.60.24
तस्याः सुदुःखभयशोकविनष्टबुद्धे-
र्हस्ताच्छ्लथद्वलयतो व्यजनं पपात।
देहश्च विक्लवधियः सहसैव मुह्यन्
रम्भेव वायुविहता प्रविकीर्य केशान्॥ २४
tasyāḥ suduḥkhabhayaśokavinaṣṭabuddhe-
rhastācchlathadvalayato vyajanaṃ papāta|
dehaśca viklavadhiyaḥ sahasaiva muhyan
rambheva vāyuvihatā pravikīrya keśān|| 24
अर्थ
अत्यन्त व्यथा, भय और शोकके कारण विचारशक्ति लुप्त हो गयी, वियोगकी सम्भावनासे वे तत्क्षण इतनी दुबली हो गयीं कि उनकी कलाईका कंगनतक खिसक गया। हाथका चँवर गिर पड़ा, बुद्धिकी विकलताके कारण वे एकाएक अचेत हो गयीं, केश बिखर गये और वे वायुवेगसे उखड़े हुए केलेके खंभेकी तरह धरतीपर गिर पड़ीं॥ २४॥