रुक्मिणीजीका महल बड़ा ही सुन्दर था। उसमें ऐसे-ऐसे चँदोवे तने हुए थे, जिनमें मोतियोंकी लड़ियोंकी झालरें लटक रही थीं। मणियोंके दीपक जगमगा रहे थे॥ ३॥✎ 143721162117
तस्मिन्नन्तर्गृहे भ्राजन्मुक्तादामविलम्बिना।
विराजिते वितानेन दीपैर्मणिमयैरपि॥ ३
रुक्मिणीजीका महल बड़ा ही सुन्दर था। उसमें ऐसे-ऐसे चँदोवे तने हुए थे, जिनमें मोतियोंकी लड़ियोंकी झालरें लटक रही थीं। मणियोंके दीपक जगमगा रहे थे॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 510) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/60/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)