श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

तस्मिन्‍नन्तर्गृहे भ्राजन्मुक्तादामविलम्बिना।

विराजिते वितानेन दीपैर्मणिमयैरपि॥ ३

tasminnantargṛhe bhrājanmuktādāmavilambinā|

virājite vitānena dīpairmaṇimayairapi|| 3

अर्थ

रुक्मिणीजीका महल बड़ा ही सुन्दर था। उसमें ऐसे-ऐसे चँदोवे तने हुए थे, जिनमें मोतियोंकी लड़ियोंकी झालरें लटक रही थीं। मणियोंके दीपक जगमगा रहे थे॥ ३॥✎ 1437 2116 2117

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1437 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महक → मँहक
  • #2116 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2117 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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