मेरी परमप्रिये! सुन्दरी! घरके काम-धंधोंमें रात-दिन लगे रहनेवाले गृहस्थोंके लिये घर-गृहस्थीमें इतना ही तो परम लाभ है कि अपनी प्रिय अर्द्धांगिनीके साथ हास-परिहास करते हुए कुछ घड़ियाँ सुखसे बिता ली जाती हैं॥ ३१॥✎ 2119
अयं हि परमो लाभो गृहेषु गृहमेधिनाम्।
यन्नर्मैर्नीयते यामः प्रियया भीरु भामिनि॥ ३१
मेरी परमप्रिये! सुन्दरी! घरके काम-धंधोंमें रात-दिन लगे रहनेवाले गृहस्थोंके लिये घर-गृहस्थीमें इतना ही तो परम लाभ है कि अपनी प्रिय अर्द्धांगिनीके साथ हास-परिहास करते हुए कुछ घड़ियाँ सुखसे बिता ली जाती हैं॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 514) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/60/31/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)