श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

अयं हि परमो लाभो गृहेषु गृहमेधिनाम्।

यन्‍नर्मैर्नीयते यामः प्रियया भीरु भामिनि॥ ३१

ayaṃ hi paramo lābho gṛheṣu gṛhamedhinām|

yannarmairnīyate yāmaḥ priyayā bhīru bhāmini|| 31

अर्थ

मेरी परमप्रिये! सुन्दरी! घरके काम-धंधोंमें रात-दिन लगे रहनेवाले गृहस्थोंके लिये घर-गृहस्थीमें इतना ही तो परम लाभ है कि अपनी प्रिय अर्द्धांगिनीके साथ हास-परिहास करते हुए कुछ घड़ियाँ सुखसे बिता ली जाती हैं॥ ३१॥✎ 2119

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2119 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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