श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

सैवं भगवता राजन् वैदर्भी परिसान्त्विता।

ज्ञात्वा तत्परिहासोक्तिं प्रियत्यागभयं जहौ॥ ३२

saivaṃ bhagavatā rājan vaidarbhī parisāntvitā|

jñātvā tatparihāsoktiṃ priyatyāgabhayaṃ jahau|| 32

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! जब भगवान् श्रीकृष्णने अपनी प्राणप्रियाको इस प्रकार समझाया-बुझाया, तब उन्हें इस बातका विश्‍वास हो गया कि मेरे प्रियतमने केवल परिहासमें ही ऐसा कहा था। अब उनके हृदयसे यह भय जाता रहा कि प्यारे हमें छोड़ देंगे॥ ३२॥

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