श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.39

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

त्वं न्यस्तदण्डमुनिभिर्गदितानुभाव

आत्माऽऽत्मदश्‍च जगतामिति मे वृतोऽसि।

हित्वा भवद्भ्रुव उदीरितकालवेग-

ध्वस्ताशिषोऽब्जभवनाकपतीन् कुतोऽन्ये॥ ३९

tvaṃ nyastadaṇḍamunibhirgaditānubhāva

ātmā''tmadaśca jagatāmiti me vṛto'si|

hitvā bhavadbhruva udīritakālavega-

dhvastāśiṣo'bjabhavanākapatīn kuto'nye|| 39

अर्थ

यह ठीक है कि भिक्षुकोंने आपकी प्रशंसा की है। परन्तु किन भिक्षुकोंने? उन परमशान्त संन्यासी महात्माओंने आपकी महिमा और प्रभावका वर्णन किया है, जिन्होंने अपराधी-से-अपराधी व्यक्तिको भी दण्ड न देनेका निश्‍चय कर लिया है। मैंने अदूरदर्शितासे नहीं, इस बातको समझते हुए आपको वरण किया है कि आप सारे जगत‍्के आत्मा हैं और अपने प्रेमियोंको आत्मदान करते हैं। मैंने जान-बूझकर उन ब्रह्मा और देवराज इन्द्र आदिका भी इसलिये परित्याग कर दिया है कि आपकी भौंहोंके इशारेसे पैदा होनेवाला काल अपने वेगसे उनकी आशा-अभिलाषाओंपर पानी फेर देता है। फिर दूसरोंकी—शिशुपाल, दन्तवक्त्र या जरासन्धकी तो बात ही क्या है?॥ ३९॥

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