श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

जाड्यं वचस्तव गदाग्रज यस्तु भूपान्

विद्राव्य शार्ङ्गनिनदेन जहर्थ मां त्वम्।

सिंहो यथा स्वबलिमीश पशून् स्वभागं

तेभ्यो भयाद् यदुदधिं शरणं प्रपन्‍नः॥ ४०

jāḍyaṃ vacastava gadāgraja yastu bhūpān

vidrāvya śārṅganinadena jahartha māṃ tvam|

siṃho yathā svabalimīśa paśūn svabhāgaṃ

tebhyo bhayād yadudadhiṃ śaraṇaṃ prapannaḥ|| 40

अर्थ

सर्वेश्‍वर आर्यपुत्र! आपकी यह बात किसी प्रकार युक्तिसंगत नहीं मालूम होती कि आप राजाओंसे भयभीत होकर समुद्रमें आ बसे हैं। क्योंकि आपने केवल अपने शार्ङ्गधनुषके टंकारसे मेरे विवाहके समय आये हुए समस्त राजाओंको भगाकर अपने चरणोंमें समर्पित मुझ दासीको उसी प्रकार हरण कर लिया, जैसे सिंह अपनी कर्कश ध्वनिसे वन-पशुओंको भगाकर अपना भाग ले आवे॥ ४०॥

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