॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.60.41
यद्वाञ्छया नृपशिखामणयोऽङ्गवैन्य-
जायन्तनाहुषगयादय ऐकपत्यम्।
राज्यं विसृज्य विविशुर्वनमम्बुजाक्ष
सीदन्ति तेऽनुपदवीं त इहास्थिताः किम्॥ ४१
yadvāñchayā nṛpaśikhāmaṇayo'ṅgavainya-
jāyantanāhuṣagayādaya aikapatyam|
rājyaṃ visṛjya viviśurvanamambujākṣa
sīdanti te'nupadavīṃ ta ihāsthitāḥ kim|| 41
अर्थ
कमलनयन! आप कैसे कहते हैं कि जो मेरा अनुसरण करता है, उसे प्रायः कष्ट ही उठाना पड़ता है। प्राचीन कालके अंग, पृथु, भरत, ययाति और गय आदि जो बड़े-बड़े राजराजेश्वर अपना-अपना एकछत्र साम्राज्य छोड़कर आपको पानेकी अभिलाषासे तपस्या करने वनमें चले गये थे, वे आपके मार्गका अनुसरण करनेके कारण क्या किसी प्रकारका कष्ट उठा रहे हैं॥ ४१॥