रुक्मिणीजीने अपनी सखीके हाथसे वह चँवर ले लिया, जिसमें रत्नोंकी डाँडी लगी थी और परमरूपवती लक्ष्मीरूपिणी देवी रुक्मिणीजी उसे डुला-डुलाकर भगवान्की सेवा करने लगीं॥ ७॥✎ 143721162117
वालव्यजनमादाय रत्नदण्डं सखीकरात्।
तेन वीजयती देवी उपासांचक्र ईश्वरम्॥ ७
रुक्मिणीजीने अपनी सखीके हाथसे वह चँवर ले लिया, जिसमें रत्नोंकी डाँडी लगी थी और परमरूपवती लक्ष्मीरूपिणी देवी रुक्मिणीजी उसे डुला-डुलाकर भगवान्की सेवा करने लगीं॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 511) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/60/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)