श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.61.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 61 · अथैकषष्टितमोऽध्यायः

गृहादनपगं वीक्ष्य राजपुत्र्योऽच्युतं स्थितम्।✎ 2121

प्रेष्ठं न्यमंसत स्वं स्वं न तत्तत्त्वविदः स्त्रियः॥ २

gṛhādanapagaṃ vīkṣya rājaputryo'cyutaṃ sthitam|

preṣṭhaṃ nyamaṃsata svaṃ svaṃ na tattattvavidaḥ striyaḥ|| 2

अर्थ

राजकुमारियाँ देखतीं कि भगवान् श्रीकृष्ण हमारे महलसे कभी बाहर नहीं जाते। सदा हमारे ही पास बने रहते हैं। इससे वे यही समझतीं कि श्रीकृष्णको मैं ही सबसे प्यारी हूँ। परीक्षित्! सच पूछो तो वे अपने पति भगवान् श्रीकृष्णका तत्त्व—उनकी महिमा नहीं समझती थीं॥ २॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2121 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): जपुत्रॺोऽच्यु → जपुत्र्योऽच्यु

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