एक तो रुक्मीके सिरपर मौत सवार थी और दूसरे उसके साथी दुष्ट राजाओंने भी उसे उभाड़ रखा था। इससे उसने आकाशवाणीपर कोई ध्यान न दिया और बलरामजीकी हँसी उड़ाते हुए कहा—॥ ३४॥✎ 1696
तामनादृत्य वैदर्भो दुष्टराजन्यचोदितः।
संकर्षणं परिहसन् बभाषे कालचोदितः॥ ३४
एक तो रुक्मीके सिरपर मौत सवार थी और दूसरे उसके साथी दुष्ट राजाओंने भी उसे उभाड़ रखा था। इससे उसने आकाशवाणीपर कोई ध्यान न दिया और बलरामजीकी हँसी उड़ाते हुए कहा—॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.61.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 524) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/61/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)