श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.62.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 62 · अथ द्विषष्टितमोऽध्यायः

इत्युक्तः कुमतिर्हृष्टः स्वगृहं प्राविशन्‍नृप।

प्रतीक्षन् गिरिशादेशं स्ववीर्यनशनं कुधीः॥ ११

ityuktaḥ kumatirhṛṣṭaḥ svagṛhaṃ prāviśannṛpa|

pratīkṣan giriśādeśaṃ svavīryanaśanaṃ kudhīḥ|| 11

अर्थ

परीक्षित्! बाणासुरकी बुद्धि इतनी बिगड़ गयी थी कि भगवान् शंकरकी बात सुनकर उसे बड़ा हर्ष हुआ और वह अपने घर लौट गया। अब वह मूर्ख भगवान् शंकरके आदेशानुसार उस युद्धकी प्रतीक्षा करने लगा, जिसमें उसके बल-वीर्यका नाश होनेवाला था॥ ११॥

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