श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.62.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 62 · अथ द्विषष्टितमोऽध्यायः

सा तत्र तमपश्यन्ती क्वासि कान्तेति वादिनी।

सखीनां मध्य उत्तस्थौ विह्वला व्रीडिता भृशम्॥ १३

sā tatra tamapaśyantī kvāsi kānteti vādinī|

sakhīnāṃ madhya uttasthau vihvalā vrīḍitā bhṛśam|| 13

अर्थ

स्वप्नमें ही उन्हें न देखकर वह बोल उठी—‘प्राणप्यारे! तुम कहाँ हो?’ और उसकी नींद टूट गयी। वह अत्यन्त विह्वलताके साथ उठ बैठी और यह देखकर कि मैं सखियोंके बीचमें हूँ, बहुत ही लज्जित हुई॥ १३॥

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