श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.62.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 62 · अथ द्विषष्टितमोऽध्यायः

भगवान् सर्वभूतेशः शरण्यो भक्तवत्सलः।

वरेणच्छन्दयामास स तं वव्रे पुराधिपम्॥ ५

bhagavān sarvabhūteśaḥ śaraṇyo bhaktavatsalaḥ|

vareṇacchandayāmāsa sa taṃ vavre purādhipam|| 5

अर्थ

सचमुच भगवान् शंकर बड़े ही भक्तवत्सल और शरणागतरक्षक हैं। समस्त भूतोंके एकमात्र स्वामी प्रभुने बाणासुरसे कहा—‘तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो।’ बाणासुरने कहा—‘भगवन्! आप मेरे नगरकी रक्षा करते हुए यहीं रहा करें’॥ ५॥

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