मैंने धर्मसंकटमें पड़कर उन दोनोंसे बड़ी अनुनय-विनय की और कहा कि ‘मैं बदलेमें एक लाख उत्तम गौएँ दूँगा। आपलोग मुझे यह गाय दे दीजिये॥ १९॥
अनुनीतावुभौ विप्रौ धर्मकृच्छ्रगतेन वै।
गवां लक्षं प्रकृष्टानां दास्याम्येषा प्रदीयताम्॥ १९
मैंने धर्मसंकटमें पड़कर उन दोनोंसे बड़ी अनुनय-विनय की और कहा कि ‘मैं बदलेमें एक लाख उत्तम गौएँ दूँगा। आपलोग मुझे यह गाय दे दीजिये॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 538) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/64/19/