श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

विप्रौ विवदमानौ मामूचतुः स्वार्थसाधकौ।

भवान् दातापहर्तेति तच्छ्रुत्वा मेऽभवद् भ्रमः॥ १८

viprau vivadamānau māmūcatuḥ svārthasādhakau|

bhavān dātāpaharteti tacchrutvā me'bhavad bhramaḥ|| 18

अर्थ

वे दोनों ब्राह्मण आपसमें झगड़ते हुए अपनी-अपनी बात कायम करनेके लिये मेरे पास आये। एकने कहा—‘यह गाय अभी-अभी आपने मुझे दी है’ और दूसरेने कहा कि ‘यदि ऐसी बात है तो तुमने मेरी गाय चुरा ली है।’ भगवन्! उन दोनों ब्राह्मणोंकी बात सुनकर मेरा चित्त भ्रमित हो गया॥ १८॥

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