परन्तु जब वे राजकुमार उस गिरे हुए गिरगिटको चमड़े और सूतकी रस्सियोंसे बाँधकर बाहर न निकाल सके, तब कुतूहलवश उन्होंने यह आश्चर्यमय वृत्तान्त भगवान् श्रीकृष्णके पास जाकर निवेदन किया॥ ४॥
चर्मजैस्तान्तवैः पाशैर्बद्ध्वा पतितमर्भकाः।
नाशक्नुवन् समुद्धर्तुं कृष्णायाचख्युरुत्सुकाः॥ ४
परन्तु जब वे राजकुमार उस गिरे हुए गिरगिटको चमड़े और सूतकी रस्सियोंसे बाँधकर बाहर न निकाल सके, तब कुतूहलवश उन्होंने यह आश्चर्यमय वृत्तान्त भगवान् श्रीकृष्णके पास जाकर निवेदन किया॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 536) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/64/4/