श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.42

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

यथाहं प्रणमे विप्राननुकालं समाहितः।

तथा नमत यूयं च योऽन्यथा मे स दण्डभाक्॥ ४२

yathāhaṃ praṇame viprānanukālaṃ samāhitaḥ|

tathā namata yūyaṃ ca yo'nyathā me sa daṇḍabhāk|| 42

अर्थ

जिस प्रकार मैं बड़ी सावधानीसे तीनों समय ब्राह्मणोंको प्रणाम करता हूँ, वैसे ही तुमलोग भी किया करो। जो मेरी इस आज्ञाका उल्लंघन करेगा, उसे मैं क्षमा नहीं करूँगा, दण्ड दूँगा॥ ४२॥✎ 1698 2124 2125 2126

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1698 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बहु-कुटुम्बी → बहुकुटुम्बी
  • #2124 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
  • #2125 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
  • #2126 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि

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