श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

ब्राह्मणार्थो ह्यपहृतो हर्तारं पातयत्यधः।

अजानन्तमपि ह्येनं नृगं ब्राह्मणगौरिव॥ ४३

brāhmaṇārtho hyapahṛto hartāraṃ pātayatyadhaḥ|

ajānantamapi hyenaṃ nṛgaṃ brāhmaṇagauriva|| 43

अर्थ

यदि ब्राह्मणके धनका अपहरण हो जाय तो वह अपहृत धन उस अपहरण करनेवालेको—अनजानमें उसके द्वारा यह अपराध हुआ हो तो भी—अधःपतनके गड्ढेमें डाल देता है। जैसे ब्राह्मणकी गायने अनजानमें उसे लेनेवाले राजा नृगको नरकमें डाल दिया था॥ ४३॥✎ 1698 2124 2125 2126

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1698 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बहु-कुटुम्बी → बहुकुटुम्बी
  • #2124 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
  • #2125 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
  • #2126 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि

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