यदि ब्राह्मणके धनका अपहरण हो जाय तो वह अपहृत धन उस अपहरण करनेवालेको—अनजानमें उसके द्वारा यह अपराध हुआ हो तो भी—अधःपतनके गड्ढेमें डाल देता है। जैसे ब्राह्मणकी गायने अनजानमें उसे लेनेवाले राजा नृगको नरकमें डाल दिया था॥ ४३॥✎ 1698212421252126
ब्राह्मणार्थो ह्यपहृतो हर्तारं पातयत्यधः।
अजानन्तमपि ह्येनं नृगं ब्राह्मणगौरिव॥ ४३
यदि ब्राह्मणके धनका अपहरण हो जाय तो वह अपहृत धन उस अपहरण करनेवालेको—अनजानमें उसके द्वारा यह अपराध हुआ हो तो भी—अधःपतनके गड्ढेमें डाल देता है। जैसे ब्राह्मणकी गायने अनजानमें उसे लेनेवाले राजा नृगको नरकमें डाल दिया था॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 541) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/64/43/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)