॥ श्रीहरिः ॥
एवं विश्राव्य भगवान् मुकुन्दो द्वारकौकसः३।
पावनः सर्वलोकानां विवेश निजमन्दिरम्॥ ४४
evaṃ viśrāvya bhagavān mukundo dvārakaukasaḥ|
pāvanaḥ sarvalokānāṃ viveśa nijamandiram|| 44
अर्थ
परीक्षित्! समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकावासियोंको इस प्रकार उपदेश देकर अपने महलमें चले गये॥ ४४॥✎ 1698 2124 2125 2126
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
नृगोपाख्यानं नाम चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४॥
एवं विश्राव्य भगवान् मुकुन्दो द्वारकौकसः।
पावनः सर्वलोकानां विवेश निजमन्दिरम्॥ ४४
परीक्षित्! समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकावासियोंको इस प्रकार उपदेश देकर अपने महलमें चले गये॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 541) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/64/44/टिप्पणियाँ
- ३
द्वारकाप्रजाः।
(मुद्रित पृष्ठ 541)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
- #1698 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बहु-कुटुम्बी → बहुकुटुम्बी
- #2124 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
- #2125 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
- #2126 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि