॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.65.11
मातरं पितरं भ्रातॄन् पतीन् पुत्रान् स्वसॄरपि।
यदर्थे जहिम दाशार्ह दुस्त्यजान् स्वजनान् प्रभो॥ ११
mātaraṃ pitaraṃ bhrātṝn patīn putrān svasṝrapi|
yadarthe jahima dāśārha dustyajān svajanān prabho|| 11
अर्थ
आप जानते हैं कि स्वजन-सम्बन्धियोंको छोड़ना बहुत ही कठिन है। फिर भी हमने उनके लिये माँ-बाप, भाई-बन्धु, पति-पुत्र और बहिन-बेटियोंको भी छोड़ दिया। परन्तु प्रभो! वे बात-की-बातमें हमारे सौहार्द और प्रेमका बन्धन काटकर, हमसे नाता तोड़कर परदेश चले गये; हमलोगोंको बिलकुल ही छोड़ दिया। हम चाहतीं तो उन्हें रोक लेतीं; परन्तु जब वे कहते कि हम तुम्हारे ऋणी हैं—तुम्हारे उपकारका बदला कभी नहीं चुका सकते, तब ऐसी कौन-सी स्त्री है, जो उनकी मीठी-मीठी बातोंपर विश्वास न कर लेती’॥ ११-१२॥