श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.65.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 65 · अथ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

ता नः सद्यः परित्यज्य गतः संछिन्‍नसौहृदः।

कथं नु तादृशं स्त्रीभिर्न श्रद्धीयेत भाषितम्॥ १२

tā naḥ sadyaḥ parityajya gataḥ saṃchinnasauhṛdaḥ|

kathaṃ nu tādṛśaṃ strībhirna śraddhīyeta bhāṣitam|| 12

अर्थ

आप जानते हैं कि स्वजन-सम्बन्धियोंको छोड़ना बहुत ही कठिन है। फिर भी हमने उनके लिये माँ-बाप, भाई-बन्धु, पति-पुत्र और बहिन-बेटियोंको भी छोड़ दिया। परन्तु प्रभो! वे बात-की-बातमें हमारे सौहार्द और प्रेमका बन्धन काटकर, हमसे नाता तोड़कर परदेश चले गये; हमलोगोंको बिलकुल ही छोड़ दिया। हम चाहतीं तो उन्हें रोक लेतीं; परन्तु जब वे कहते कि हम तुम्हारे ऋणी हैं—तुम्हारे उपकारका बदला कभी नहीं चुका सकते, तब ऐसी कौन-सी स्त्री है, जो उनकी मीठी-मीठी बातोंपर विश्‍वास न कर लेती’॥ ११-१२॥

यह अर्थ श्लोक 11–12 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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