श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.65.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 65 · अथ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

परिष्वक्तश्‍चिरोत्कण्ठैर्गोपैर्गोपीभिरेव च।

रामोऽभिवाद्य पितरावाशीर्भिरभिनन्दितः॥ २

pariṣvaktaścirotkaṇṭhairgopairgopībhireva ca|

rāmo'bhivādya pitarāvāśīrbhirabhinanditaḥ|| 2

अर्थ

इधर उनके लिये व्रजवासी गोप और गोपियाँ भी बहुत दिनोंसे उत्कण्ठित थीं। उन्हें अपने बीचमें पाकर सबने बड़े प्रेमसे गले लगाया। बलरामजीने माता यशोदा और नन्दबाबाको प्रणाम किया। उन लोगोंने भी आशीर्वाद देकर उनका अभिनन्दन किया॥ २॥✎ 1699

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1699 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आप-लोगोंको → आपलोगोंको

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