श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.65.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 65 · अथ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

पापे त्वं मामवज्ञाय यन्‍नायासि मयाऽऽहुता।

नेष्ये त्वां लांगलाग्रेण शतधा कामचारिणीम्॥ २४

pāpe tvaṃ māmavajñāya yannāyāsi mayā''hutā|

neṣye tvāṃ lāṃgalāgreṇa śatadhā kāmacāriṇīm|| 24

अर्थ

और कहा ‘पापिनी यमुने! मेरे बुलानेपर भी तू मेरी आज्ञाका उल्लंघन करके यहाँ नहीं आ रही है, मेरा तिरस्कार कर रही है! देख, अब मैं तुझे तेरे स्वेच्छाचारका फल चखाता हूँ। अभी-अभी तुझे हलकी नोकसे सौ-सौ टुकड़े किये देता हूँ’॥ २४॥

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