जब बलरामजीने यमुनाजीको इस प्रकार डाँटा-फटकारा, तब वे चकित और भयभीत होकर बलरामजीके चरणोंपर गिर पड़ीं और गिड़गिड़ाकर प्रार्थना करने लगीं—॥ २५॥
एवं निर्भर्त्सिता भीता यमुना यदुनन्दनम्।
उवाच चकिता वाचं पतिता पादयोर्नृप॥ २५
जब बलरामजीने यमुनाजीको इस प्रकार डाँटा-फटकारा, तब वे चकित और भयभीत होकर बलरामजीके चरणोंपर गिर पड़ीं और गिड़गिड़ाकर प्रार्थना करने लगीं—॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.65.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 545) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/65/25/