श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.65.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 65 · अथ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

परं भावं भगवतो भगवन् मामजानतीम्।

मोक्तुमर्हसि विश्‍वात्मन् प्रपन्‍नां भक्तवत्सल॥ २७

paraṃ bhāvaṃ bhagavato bhagavan māmajānatīm|

moktumarhasi viśvātman prapannāṃ bhaktavatsala|| 27

अर्थ

भगवन्! आप परम ऐश्‍वर्यशाली हैं। आपके वास्तविक स्वरूपको न जाननेके कारण ही मुझसे यह अपराध बन गया है। सर्वस्वरूप भक्तवत्सल! मैं आपकी शरणमें हूँ। आप मेरी भूल-चूक क्षमा कीजिये, मुझे छोड़ दीजिये’॥ २७॥

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