श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.65.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 65 · अथ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

वसित्वा वाससी नीले मालामामुच्य कांचनीम्।

रेजे स्वलंकृतो लिप्तो माहेन्द्र इव वारणः॥ ३०

vasitvā vāsasī nīle mālāmāmucya kāṃcanīm|

reje svalaṃkṛto lipto māhendra iva vāraṇaḥ|| 30

अर्थ

बलरामजीने नीले वस्त्र पहन लिये और सोनेकी माला गलेमें डाल ली। वे अंगराग लगाकर, सुन्दर भूषणोंसे विभूषित होकर इस प्रकार शोभायमान हुए मानो इन्द्रका श्‍वेतवर्ण ऐरावत हाथी हो॥ ३०॥

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