श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.66.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 66 · अथ षट्षष्टितमोऽध्यायः

सुदक्षिणस्तस्य सुतः कृत्वा संस्थाविधिं पितुः।

निहत्य पितृहन्तारं यास्याम्यपचितिं पितुः॥ २७

sudakṣiṇastasya sutaḥ kṛtvā saṃsthāvidhiṃ pituḥ|

nihatya pitṛhantāraṃ yāsyāmyapacitiṃ pituḥ|| 27

अर्थ

काशिनरेशका पुत्र था सुदक्षिण। उसने अपने पिताका अन्त्येष्टि-संस्कार करके मन-ही-मन यह निश्‍चय किया कि अपने पितृघातीको मारकर ही मैं पिताके ऋणसे उऋण हो सकूँगा। निदान वह अपने कुलपुरोहित और आचार्योंके साथ अत्यन्त एकाग्रतासे भगवान् शंकरकी आराधना करने लगा॥ २७-२८॥✎ 893 1953

यह अर्थ श्लोक 27–28 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #893 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1953 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ऊऋण → उऋण

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