जैसे बच्चे आपसमें खेलते समय किसी बालकको ही राजा मान लेते हैं और वह राजाकी तरह उनके साथ व्यवहार करने लगता है, वैसे ही मन्दमति अज्ञानी पौण्ड्रकने अचिन्त्यगति भगवान् श्रीकृष्णकी लीला और रहस्य न जानकर द्वारकामें उनके पास दूत भेज दिया॥ ३॥
दूतं च प्राहिणोन्मन्दः कृष्णायाव्यक्तवर्त्मने।
द्वारकायां यथा बालो नृपो बालकृतोऽबुधः॥ ३
जैसे बच्चे आपसमें खेलते समय किसी बालकको ही राजा मान लेते हैं और वह राजाकी तरह उनके साथ व्यवहार करने लगता है, वैसे ही मन्दमति अज्ञानी पौण्ड्रकने अचिन्त्यगति भगवान् श्रीकृष्णकी लीला और रहस्य न जानकर द्वारकामें उनके पास दूत भेज दिया॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.66.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 546) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/66/3/