उग्र दाढ़ों और टेढ़ी भृकुटियोंके कारण उसके मुखसे क्रूरता टपक रही थी। वह अपनी जीभसे मुँहके दोनों कोने चाट रहा था। शरीर नंग-धड़ंग था। हाथमें त्रिशूल लिये हुए था, जिसे वह बार-बार घुमाता जाता था और उसमेंसे अग्निकी लपटें निकल रही थीं॥ ३३॥✎ 8931953
दंष्ट्रोग्रभ्रुकुटीदण्डकठोरास्यः स्वजिह्वया।
आलिहन् सृक्किणी नग्नो विधुन्वंस्त्रिशिखं ज्वलन्॥ ३३
उग्र दाढ़ों और टेढ़ी भृकुटियोंके कारण उसके मुखसे क्रूरता टपक रही थी। वह अपनी जीभसे मुँहके दोनों कोने चाट रहा था। शरीर नंग-धड़ंग था। हाथमें त्रिशूल लिये हुए था, जिसे वह बार-बार घुमाता जाता था और उसमेंसे अग्निकी लपटें निकल रही थीं॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.66.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 549) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/66/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)