श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.66.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 66 · अथ षट्षष्टितमोऽध्यायः

दंष्ट्रोग्रभ्रुकुटीदण्डकठोरास्यः स्वजिह्वया।

आलिहन् सृक्किणी न‌ग्‍नो विधुन्वंस्त्रिशिखं ज्वलन्॥ ३३

daṃṣṭrograbhrukuṭīdaṇḍakaṭhorāsyaḥ svajihvayā|

ālihan sṛkkiṇī nagno vidhunvaṃstriśikhaṃ jvalan|| 33

अर्थ

उग्र दाढ़ों और टेढ़ी भृकुटियोंके कारण उसके मुखसे क्रूरता टपक रही थी। वह अपनी जीभसे मुँहके दोनों कोने चाट रहा था। शरीर नंग-धड़ंग था। हाथमें त्रिशूल लिये हुए था, जिसे वह बार-बार घुमाता जाता था और उसमेंसे अग्‍निकी लपटें निकल रही थीं॥ ३३॥✎ 893 1953

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #893 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1953 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ऊऋण → उऋण

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