॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.68.14
सान्त्वयित्वा तु तान् रामः सन्नद्धान् वृष्णिपुंगवान्।
नैच्छत् कुरूणां वृष्णीनां कलिं कलिमलापहः॥ १४
sāntvayitvā tu tān rāmaḥ sannaddhān vṛṣṇipuṃgavān|
naicchat kurūṇāṃ vṛṣṇīnāṃ kaliṃ kalimalāpahaḥ|| 14
अर्थ
बलरामजी कलहप्रधान कलियुगके सारे पाप-तापको मिटानेवाले हैं। उन्होंने कुरुवंशियों और यदुवंशियोंके लड़ाई-झगड़ेको ठीक न समझा। यद्यपि यदुवंशी अपनी तैयारी पूरी कर चुके थे, फिर भी उन्होंने उन्हें शान्त कर दिया और स्वयं सूर्यके समान तेजस्वी रथपर सवार होकर हस्तिनापुर गये। उनके साथ कुछ ब्राह्मण और यदुवंशके बड़े-बूढ़े भी गये। उनके बीचमें बलरामजीकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो चन्द्रमा ग्रहोंसे घिरे हुए हों॥ १४-१५॥