श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.68.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 68 · अथाष्टषष्टितमोऽध्यायः

जगाम हास्तिनपुरं रथेनादित्यवर्चसा।

ब्राह्मणैः कुलवृद्धैश्‍च वृतश्‍चन्द्र इव ग्रहैः॥ १५

jagāma hāstinapuraṃ rathenādityavarcasā|

brāhmaṇaiḥ kulavṛddhaiśca vṛtaścandra iva grahaiḥ|| 15

अर्थ

बलरामजी कलहप्रधान कलियुगके सारे पाप-तापको मिटानेवाले हैं। उन्होंने कुरुवंशियों और यदुवंशियोंके लड़ाई-झगड़ेको ठीक न समझा। यद्यपि यदुवंशी अपनी तैयारी पूरी कर चुके थे, फिर भी उन्होंने उन्हें शान्त कर दिया और स्वयं सूर्यके समान तेजस्वी रथपर सवार होकर हस्तिनापुर गये। उनके साथ कुछ ब्राह्मण और यदुवंशके बड़े-बूढ़े भी गये। उनके बीचमें बलरामजीकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो चन्द्रमा ग्रहोंसे घिरे हुए हों॥ १४-१५॥

यह अर्थ श्लोक 14–15 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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