श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.69.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 69 · अथैकोनसप्ततितमोऽध्यायः

तस्यावनिज्य चरणौ तदपः स्वमूर्ध्ना

बिभ्रज्जगद्गुरुतरोऽपि सतां पतिर्हि।

ब्रह्मण्यदेव इति यद्गुणनाम युक्तं

तस्यैव यच्चरणशौचमशेषतीर्थम्॥ १५

tasyāvanijya caraṇau tadapaḥ svamūrdhnā

bibhrajjagadgurutaro'pi satāṃ patirhi|

brahmaṇyadeva iti yadguṇanāma yuktaṃ

tasyaiva yaccaraṇaśaucamaśeṣatīrtham|| 15

अर्थ

परीक्षित्! इसमें सन्देह नहीं कि भगवान् श्रीकृष्ण चराचर जगत‍्के परम गुरु हैं और उनके चरणोंका धोवन गंगाजल सारे जगत‍्को पवित्र करनेवाला है। फिर भी वे परमभक्तवत्सल और संतोंके परम आदर्श, उनके स्वामी हैं। उनका एक असाधारण नाम ब्रह्मण्यदेव भी है। वे ब्राह्मणोंको ही अपना आराध्यदेव मानते हैं। उनका यह नाम उनके गुणके अनुरूप एवं उचित ही है। तभी तो भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं ही नारदजीके पाँव पखारे और उनका चरणामृत अपने सिरपर धारण किया॥ १५॥✎ 1704

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1704 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मुकुट-मणि → मुकुटमणि

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