श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.69.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 69 · अथैकोनसप्ततितमोऽध्यायः

अथोवाच हृषीकेशं नारदः प्रहसन्‍निव।

योगमायोदयं वीक्ष्य मानुषीमीयुषो गतिम्॥ ३७

athovāca hṛṣīkeśaṃ nāradaḥ prahasanniva|

yogamāyodayaṃ vīkṣya mānuṣīmīyuṣo gatim|| 37

अर्थ

परीक्षित्! इस प्रकार मनुष्यकी-सी लीला करते हुए हृषीकेश भगवान् श्रीकृष्णकी योगमायाका वैभव देखकर देवर्षि नारदजीने मुसकराते हुए उनसे कहा—॥ ३७॥✎ 1706

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1706 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: योग-माया → योगमाया

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