॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.69.6
विभक्तरथ्यापथचत्वरापणैः
शालासभाभी रुचिरां सुरालयैः।
संसिक्तमार्गांगणवी१थिदेहलीं
पतत्पताकाध्वजवारितातपाम्२॥ ६
vibhaktarathyāpathacatvarāpaṇaiḥ
śālāsabhābhī rucirāṃ surālayaiḥ|
saṃsiktamārgāṃgaṇavīthidehalīṃ
patatpatākādhvajavāritātapām|| 6
अर्थ
उसके राजपथ (बड़ी-बड़ी सड़कें), गलियाँ, चौराहे और बाजार बहुत ही सुन्दर-सुन्दर थे। घुड़साल आदि पशुओंके रहनेके स्थान, सभा-भवन और देव-मन्दिरोंके कारण उसका सौन्दर्य और भी चमक उठा था। उसकी सड़कों, चौक, गली और दरवाजोंपर छिड़काव किया गया था। छोटी-छोटी झंडियाँ और बड़े-बड़े झंडे जगह-जगह फहरा रहे थे, जिनके कारण रास्तोंपर धूप नहीं आ पाती थी॥ ६॥
टिप्पणियाँ
- १
थिशोभां।
- २
प्रा प्रतिमें ‘...वारितातपाम्॥’ इस श्लोकके बाद ‘उत्फुल्लेन्दीवराम्भोजकह्लारकुमुदोत्पलैः। छुरितेषु सरस्सूच्चैः कूजितां हंससारसैः॥ पुष्पितोपवनारामद्विजालिकुलनादिताम्।’ इस डेढ़ श्लोकका पाठ है, इसके पहले नहीं।