उस समय तृणावर्तने बवंडररूपसे इतनी बालू उड़ा रखी थी कि सभी लोग अत्यन्त उद्विग्न और बेसुध हो गये थे। उन्हें अपना-पराया कुछ भी नहीं सूझ रहा था॥ २३॥
नापश्यत् कश्चनात्मानं परं चापि विमोहितः।
तृणावर्तनिसृष्टाभिः शर्कराभिरुपद्रुतः॥ २३
उस समय तृणावर्तने बवंडररूपसे इतनी बालू उड़ा रखी थी कि सभी लोग अत्यन्त उद्विग्न और बेसुध हो गये थे। उन्हें अपना-पराया कुछ भी नहीं सूझ रहा था॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.7.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 165) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/7/23/