श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.7.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

रुदितमनुनिशम्य तत्र गोप्यो

भृशमनुतप्तधियोऽश्रुपूर्णमुख्यः ।

रुरुदुरनुपलभ्य नन्दसूनुं

पवन उपारतपांसुवर्षवेगे॥ २५

ruditamanuniśamya tatra gopyo

bhṛśamanutaptadhiyo'śrupūrṇamukhyaḥ |

ruruduranupalabhya nandasūnuṃ

pavana upāratapāṃsuvarṣavege|| 25

अर्थ

बवंडरके शान्त होनेपर जब धूलकी वर्षाका वेग कम हो गया, तब यशोदाजीके रोनेका शब्द सुनकर दूसरी गोपियाँ वहाँ दौड़ आयीं। नन्दनन्दन श्यामसुन्दर श्रीकृष्णको न देखकर उनके हृदयमें भी बड़ा संताप हुआ, आँखोंसे आँसूकी धारा बहने लगी। वे फूट-फूटकर रोने लगीं॥ २५॥

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