श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.7.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

सा वीक्ष्य विश्‍वं सहसा राजन् संजातवेपथुः।

सम्मील्य मृगशावाक्षी नेत्रे आसीत् सुविस्मिता॥ ३७

sā vīkṣya viśvaṃ sahasā rājan saṃjātavepathuḥ|

sammīlya mṛgaśāvākṣī netre āsīt suvismitā|| 37

अर्थ

परीक्षित्! अपने पुत्रके मुँहमें इस प्रकार सहसा सारा जगत् देखकर मृगशावकनयनी यशोदाजीका शरीर काँप उठा। उन्होंने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें बन्द कर लीं*। वे अत्यन्त आश्‍चर्यचकित हो गयीं॥ ३७॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे
तृणावर्तमोक्षो नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    वात्सल्यमयी यशोदा माता अपने लालाके मुखमें विश्‍व देखकर डर गयीं, परन्तु वात्सल्य-प्रेमरस-भावित हृदय होनेसे उन्हें विश्‍वास नहीं हुआ। उन्होंने यह विचार किया कि यह विश्‍वका बखेड़ा लालाके मुँहमें कहाँसे आया? हो-न-हो यह मेरी इन निगोड़ी आँखोंकी ही गड़बड़ी है। मानो इसीसे उन्होंने अपने नेत्र बंद कर लिये।

    (मुद्रित पृष्ठ 167)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें