जब देवर्षि नारद आसन स्वीकार करके बैठ गये, तब भगवान्ने उनकी विधिपूर्वक पूजा की और अपनी श्रद्धासे उनको सन्तुष्ट करते हुए वे मधुर वाणीसे बोले—॥ ३४॥✎ 1708
सभाजयित्वा विधिवत् कृतासनपरिग्रहम्।
बभाषे सूनृतैर्वाक्यैः श्रद्धया तर्पयन् मुनिम्॥ ३४
जब देवर्षि नारद आसन स्वीकार करके बैठ गये, तब भगवान्ने उनकी विधिपूर्वक पूजा की और अपनी श्रद्धासे उनको सन्तुष्ट करते हुए वे मधुर वाणीसे बोले—॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.70.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 571) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/70/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)