भगवान् श्रीकृष्ण राजा युधिष्ठिरको आनन्दित करनेके लिये कई महीनोंतक इन्द्रप्रस्थमें ही रहे। वे समय-समयपर अर्जुनके साथ रथपर सवार होकर विहार करनेके लिये इधर-उधर चले जाया करते थे। उस समय बड़े-बड़े वीर सैनिक भी उनकी सेवाके लिये साथ-साथ जाते॥ ४६॥
उवास कतिचिन्मासान् राज्ञः प्रियचिकीर्षया।
विहरन् रथमारुह्य फाल्गुनेन भटैर्वृतः॥ ४६
भगवान् श्रीकृष्ण राजा युधिष्ठिरको आनन्दित करनेके लिये कई महीनोंतक इन्द्रप्रस्थमें ही रहे। वे समय-समयपर अर्जुनके साथ रथपर सवार होकर विहार करनेके लिये इधर-उधर चले जाया करते थे। उस समय बड़े-बड़े वीर सैनिक भी उनकी सेवाके लिये साथ-साथ जाते॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.71.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 580) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/71/46/