tannaḥ prayaccha bhadraṃ te yad vayaṃ kāmayāmahe|| 18
अर्थ
‘राजन्! आपका कल्याण हो। हम तीनों आपके अतिथि हैं और बहुत दूरसे आ रहे हैं। अवश्य ही हम यहाँ किसी विशेष प्रयोजनसे ही आये हैं। इसलिये हम आपसे जो कुछ चाहते हैं, वह आप हमें अवश्य दीजिये॥ १८॥
राजन् विद्ध्यतिथीन् प्राप्तानर्थिनो दूरमागतान्।
तन्नः प्रयच्छ भद्रं ते यद् वयं कामयामहे॥ १८
‘राजन्! आपका कल्याण हो। हम तीनों आपके अतिथि हैं और बहुत दूरसे आ रहे हैं। अवश्य ही हम यहाँ किसी विशेष प्रयोजनसे ही आये हैं। इसलिये हम आपसे जो कुछ चाहते हैं, वह आप हमें अवश्य दीजिये॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.72.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 582) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/72/18/