श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.72.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 72 · अथ द्विसप्ततितमोऽध्यायः

राजन्यबन्धवो ह्येते ब्रह्मलिंगानि बिभ्रति।

ददामि भिक्षितं तेभ्य आत्मानमपि दुस्त्यजम्॥ २३

rājanyabandhavo hyete brahmaliṃgāni bibhrati|

dadāmi bhikṣitaṃ tebhya ātmānamapi dustyajam|| 23

अर्थ

फिर उसने मन-ही-मन यह विचार किया कि ‘ये क्षत्रिय होनेपर भी मेरे भयसे ब्राह्मणका वेष बनाकर आये हैं। जब ये भिक्षा माँगनेपर ही उतारू हो गये हैं, तब चाहे जो कुछ माँग लें, मैं इन्हें दूँगा। याचना करनेपर अपना अत्यन्त प्यारा और दुस्त्यज शरीर देनेमें भी मुझे हिचकिचाहट न होगी॥ २३॥

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