मेरा तो यह पक्का निश्चय है कि यह शरीर नाशवान् है। इस शरीरसे जो विपुल यश नहीं कमाता और जो क्षत्रिय ब्राह्मणके लिये ही जीवन नहीं धारण करता, उसका जीना व्यर्थ है’॥ २६॥
जीवता ब्राह्मणार्थाय को न्वर्थः क्षत्रबन्धुना।
देहेन पतमानेन नेहता विपुलं यशः॥ २६
मेरा तो यह पक्का निश्चय है कि यह शरीर नाशवान् है। इस शरीरसे जो विपुल यश नहीं कमाता और जो क्षत्रिय ब्राह्मणके लिये ही जीवन नहीं धारण करता, उसका जीना व्यर्थ है’॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.72.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 584) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/72/26/