श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.72.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 72 · अथ द्विसप्ततितमोऽध्यायः

श्रियं जिहीर्षतेन्द्रस्य विष्णवे द्विजरूपिणे।

जानन्‍नपि महीं प्रादाद् वार्यमाणोऽपि दैत्यराट्॥ २५

śriyaṃ jihīrṣatendrasya viṣṇave dvijarūpiṇe|

jānannapi mahīṃ prādād vāryamāṇo'pi daityarāṭ|| 25

अर्थ

इसमें सन्देह नहीं कि विष्णुभगवान्‌ने देवराज इन्द्रकी राज्यलक्ष्मी बलिसे छीनकर उन्हें लौटानेके लिये ही ब्राह्मणरूप धारण किया था। दैत्यराज बलिको यह बात मालूम हो गयी थी और शुक्राचार्यने उन्हें रोका भी; परन्तु उन्होंने पृथ्वीका दान कर ही दिया॥ २५॥

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