श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.72.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 72 · अथ द्विसप्ततितमोऽध्यायः

इत्थं तयोः प्रहतयोर्गदयोर्नृवीरौ

क्रुद्धौ स्वमुष्टिभिरयःस्पर्शैरपिष्टाम्।

शब्दस्तयोः प्रहरतोरिभयोरिवासी-

न्‍निर्घातवज्रपरुषस्तलताडनोत्थः ॥ ३८

itthaṃ tayoḥ prahatayorgadayornṛvīrau

kruddhau svamuṣṭibhirayaḥsparśairapiṣṭām|

śabdastayoḥ praharatoribhayorivāsī-

nnirghātavajraparuṣastalatāḍanotthaḥ || 38

अर्थ

इस प्रकार जब गदाएँ चूर-चूर हो गयीं, तब दोनों वीर क्रोधमें भरकर अपने घूँसोंसे एक-दूसरेको कुचल डालनेकी चेष्टा करने लगे। उनके घूँसे ऐसी चोट करते, मानो लोहेका घन गिर रहा हो। एक-दूसरेपर खुलकर चोट करते हुए दो हाथियोंकी तरह उनके थप्पड़ों और घूँसोंका कठोर शब्द बिजलीकी कड़-कड़ाहटके समान जान पड़ता था॥ ३८॥

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