श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.73.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 73 · अथ त्रिसप्ततितमोऽध्यायः

अथो न राज्यं मृगतृष्णिरूपितं

देहेन शश्‍वत् पतता रुजां भुवा।

उपासितव्यं स्पृहयामहे विभो

क्रियाफलं प्रेत्य च कर्णरोचनम्॥ १४

atho na rājyaṃ mṛgatṛṣṇirūpitaṃ

dehena śaśvat patatā rujāṃ bhuvā|

upāsitavyaṃ spṛhayāmahe vibho

kriyāphalaṃ pretya ca karṇarocanam|| 14

अर्थ

विभो! यह शरीर दिनोदिन क्षीण होता जा रहा है। रोगोंकी तो यह जन्मभूमि ही है। अब हमें इस शरीरसे भोगे जानेवाले राज्यकी अभिलाषा नहीं है। क्योंकि हम समझ गये हैं कि वह मृगतृष्णाके जलके समान सर्वथा मिथ्या है। यही नहीं, हमें कर्मके फल स्वर्गादि लोकोंकी भी, जो मरनेके बाद मिलते हैं, इच्छा नहीं है। क्योंकि हम जानते हैं कि वे निस्सार हैं, केवल सुननेमें ही आकर्षक जान पड़ते हैं॥ १४॥✎ 1709

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1709 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कहलाने-वाले → कहलानेवाले

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