श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.73.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 73 · अथ त्रिसप्ततितमोऽध्यायः

तं नः समादिशोपायं येन ते चरणाब्जयोः।

स्मृतिर्यथा न विरमेदपि संसरतामिह॥ १५

taṃ naḥ samādiśopāyaṃ yena te caraṇābjayoḥ|

smṛtiryathā na viramedapi saṃsaratāmiha|| 15

अर्थ

अब हमें कृपा करके आप वह उपाय बतलाइये, जिससे आपके चरणकमलोंकी विस्मृति कभी न हो, सर्वदा स्मृति बनी रहे। चाहे हमें संसारकी किसी भी योनिमें जन्म क्यों न लेना पड़े॥ १५॥✎ 1709

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1709 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कहलाने-वाले → कहलानेवाले

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