श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.73.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 73 · अथ त्रिसप्ततितमोऽध्यायः

सन्तन्वन्तः प्रजातन्तून् सुखं दुःखं भवाभवौ।

प्राप्तं प्राप्तं च सेवन्तो मच्चित्ता विचरिष्यथ॥ २२

santanvantaḥ prajātantūn sukhaṃ duḥkhaṃ bhavābhavau|

prāptaṃ prāptaṃ ca sevanto maccittā vicariṣyatha|| 22

अर्थ

तुमलोग अपनी वंश-परम्पराकी रक्षाके लिये, भोगके लिये नहीं, सन्तान उत्पन्‍न करो और प्रारब्धके अनुसार जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख, लाभ-हानि—जो कुछ भी प्राप्त हों, उन्हें समानभावसे मेरा प्रसाद समझकर सेवन करो और अपना चित्त मुझमें लगाकर जीवन बिताओ॥ २२॥✎ 1710

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1710 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: तुम-लोगोंने → तुमलोगोंने

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