॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.73.22
सन्तन्वन्तः प्रजातन्तून् सुखं दुःखं भवाभवौ।
प्राप्तं प्राप्तं च सेवन्तो मच्चित्ता विचरिष्यथ॥ २२
santanvantaḥ prajātantūn sukhaṃ duḥkhaṃ bhavābhavau|
prāptaṃ prāptaṃ ca sevanto maccittā vicariṣyatha|| 22
अर्थ
तुमलोग अपनी वंश-परम्पराकी रक्षाके लिये, भोगके लिये नहीं, सन्तान उत्पन्न करो और प्रारब्धके अनुसार जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख, लाभ-हानि—जो कुछ भी प्राप्त हों, उन्हें समानभावसे मेरा प्रसाद समझकर सेवन करो और अपना चित्त मुझमें लगाकर जीवन बिताओ॥ २२॥✎ 1710